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भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति

 हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में समाजवाद की अवधारणा को स्वीकार किया है। समाजवाद जो मुख्य रूप से एक आर्थिक अवधारणा है, को अपनाने का उद्देश्य महत्तम लोक कल्याण को सुनिश्चित करना है संविधान में जिस समाजवाद को अपनाया गया है वह हमारे नीति कारों के व्यवहारिक अनुभव का परिणाम था।

                                         1929 कि वैश्विक आर्थिक मंदी से केवल रूस अछूता रहा था जहां अर्थव्यवस्था की समाजवादी प्रकृति मौजूद थे हमारे तत्कालीन युवा राष्ट्रवादी समाजवादी विचारों से प्रभावित हुए जिसकी झलक हमें कांग्रेस के अधिवेशनों में मिलती है।

                                     परंतु रूस के समाजवाद से भारतीय समाजवाद भिन्न था क्योंकि यहां राज्य के साथ-साथ निजी उत्पादन इकाइयों के अस्तित्व को भी स्वीकार किया गया जिसका कारण था स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय पूंजी पतियों का योगदान।

                         इस दौरान भारतीय पूंजी पतियों ने स्वदेशी आयोग की स्थापना में अपना योगदान दिया साथ ही समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किया साथ ही नीति कारों के समक्ष पूंजी पतियों का चरित्र भी व्यावहारिक रूप से सिद्ध था।

     इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति शुरुआत से ही मिश्रित रही है परंतु बदलते समय के साथ राज्य एवं निजी आर्थिक क्रियाकलाप के अंशों में परिवर्तन होता चला गया।

                                            1991 से पहले जहां सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों का योगदान सर्वाधिक था वहीं 1991 के बाद निजी उपक्रमों के योगदान में धीरे-धीरे वृद्धि होती चली गई इससे हम उत्पादन एवं वितरण के स्तर पर समझ सकते हैं।


                 1991 से पहले                    1991 के बाद

उत्पादन             राज्य                               निजी

वितरण              राज्य                               राज्य


1991 से पूर्व समाजवाद की प्रकृति ज्यादा थी जिसमें निजी क्षेत्र का प्रवेश सीमित था 1991 के पश्चात पूंजीवाद की प्रकृति में बढ़ोतरी हुई निजी उद्यमों का प्रवेश आसान हो गया परंतु निकास में समस्या बनी है इसे ही चक्रव्यूह प्रणाली कहां गया।

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